Chapter-12  आधारित संरचना

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    आधारित संरचना :- इससे अभिप्राय आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन के उन मूल तत्वों से है जो अर्थव्यवस्था की उत्पादन गतिविधि में सहयोगी व्यवस्था के रूप में काम करते है I जिसके बिना आर्थिक व्रद्धी और सामाजिक विकास वास्तव में संभव नही है I   आर्थिक आधारिक संरचना :- इससे अभिप्राय आर्थिक परिवर्तन के उन तत्वों (जैसे-शक्ति, परिवहन एवं संचार) से है जो आर्थिक सम्वृध्धि प्रक्रिया में नीव के रूप में काम करते है I   सामाजिक आधारित संरचना :- इससे अभिप्राय आर्थिक परिवर्तन के उन तत्वों (जैसे-स्कूल, कालेज एवं अस्पताल) से है जो देश के सामाजिक विकास में नीव के रूप में काम करते है I   आधारिक संरचना  आर्थिक  विकास  के  लिए  विविध  रूप  से योगदान  देती  है आधारिक संरचना उत्पादकता को बढ़ती है, आधारिक संरचना निवेश…
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ch 11 मुद्रा-स्फीति: समस्याए एवं नीतियाँ

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    मुद्रा-स्फीति : इससे अभिप्राय उस स्थिति से है जिसमे सामान्य कीमत स्तर तथा स्पष्ट व्रद्धी होती है I   थोक कीमत सूचकांक : यह साप्ताहिक आधार पर थोक कीमतों में परिवर्तन को मापता है I इस सूचकांक में लगभग 435 वस्तुओ को सम्मिलित किया जाता है, इसमें सेवाओ को सम्मिलित नही किया जाता I   उपभोक्ता कीमत सूचकांक :- यह मासिक आधार पर खुर कीमतों में परिवर्तन को मापता है I इसमें वस्तुओ तथा सेवाओ दोनों को सम्मिलित किया जाता है I इसमें उपभोक्ताओ के समरूप समूह जैसे औद्दोगिक श्रमिको, कृषि श्रमिको का अध्धयन किया जाता है I   जीडीपी अपस्फायक :- GDP अप्स्फायकसे अभिप्राय चालू कीमतों पर GDP तथा स्थिर कीमतों पर GDP का अनुपात है I इसे कीमत व्यवहार का बेहतर मापक मन जाता है, क्योकि…
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Chapter 9 ग्रामीण विकास

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    ग्रामीण विकास :- इससे अभिप्राय ग्रामीण क्षेत्रो के आर्थिक तथा सामाजिक उत्थान के लिए एक क्रमबद्ध योजना से है I   ग्रामीण विकास के लिए नियोजित-कार्यविधि के मुख्य तत्व :- ग्रामीण साख की एक हष्ट पुष्ट प्रणाली विपरण की वह प्रणाली जो किसानो को अपने उत्पादन की उचित कीमत दिलाये फसलो का विविधिकरण जो उत्पादन के जोखिम को कम करे और कृषि के व्यापारीकरण को प्रोत्साहित करे उत्पादन गतिविधि का विविधीकरण ताकि फसल खेती के अतिरिक्त धारणीय जीवन के वैकल्पिक साधनों को ढूंढा जा सके, और जैविक कृषि को प्रोत्साहन देना ताकि फसल खेती पर्यावरण मैत्रिक हो और धारणीय समय की लम्बी अवधि तक चले I   ग्रामीण साख के स्रोत :- गैर-संस्थागत साख स्रोत : व्यापारी, महाजन और कमिशन एजेंट संस्थागत साख स्रोत : सहकारी साख समितियां,…
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chapter-8 भारत में मानव पुंजी निर्माण

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  मान पुंजी :- यह एक राष्ट्र के किसी  समय विशेष पर पाये जाने वाले “कौशल तथा सुविज्ञता” का भण्डार है I   मानव पुंजी निर्माण :- मानव पुंजी के स्टाक में समय के साथ, व्रद्धी करने की प्रक्रिया को मानव पुंजी निर्माण कहाजाता है I   मानव पुंजी निर्माण के निर्धारक/स्रोत :- शिक्षा पर व्यय स्वास्थ्य पर व्ययनौकरी के साथ प्रशिक्षणव्यस्को के लिए अध्धयन का कार्यक्रम स्थानान्तरण सुचना पर व्यय   मानव पुंजी निर्माण की भूमिका :- सम्वृध्दी के भावात्मक तथा भौतिक वातावरण में परिवर्तन भौतिक पुंजी की उच्चतर उत्पादकताकौशल में नवीनता समानता तथा सहभागिता की उच्च दर   मानव पुंजी निर्माण की समस्याए :- जनसंख्या में व्रद्धी प्रतिभा पलायन अपर्याप्त मानव शक्ति नियोजन प्राथमिक क्षेत्र में काम के दौरान प्रशिक्षण की अपर्याप्तता निम्न शैक्षिक मानक   शिक्षा का…
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अध्याय-7 निर्धनता

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  निर्धनता क्या है और निर्धन कौन है ?   निर्धनता से अभिप्राय है उस स्थिति से है जब कोई व्यक्ति अपनी जीवन न्यूनतम उपभोग आवश्यकताओ की प्राप्ति नहीं कर पाता , न्यूनतम आवश्यकताओ में भोजन, वस्त्र, मकान, शिक्षा तथा स्वास्थ्य सम्बन्धी न्यूनतम मानवीय आवश्यकताए शामिल होती है I   निर्धनता की दो विभिन्न अवधारणाए होती है : सापेक्ष निर्धनता निरपेक्ष निर्धनता   सापेक्ष निर्धनता : सापेक्ष निर्धनता से अभिप्राय विभिन्न वर्गो प्रदेशो या दुसरे देशो की तुलना में की जाने वाली निर्धनता से है I जिस देश या वर्ग के लोगो का जीवन स्तर या निर्वाह स्तर निचा होता है वे उच्च जीवन स्तर या निर्वाह स्तर के लोगो या देश की तुलना में गरीब या सापेक्ष रूप से निर्धन माने  जाते है I   निरपेक्ष निर्धनता : भारत…
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Chapter-6 1991 से आर्थिक सुधार या नई आर्थिक नीति

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    सन 1990 के आर्थिक संकट का सामना करने के लिए भारत सरकार ने कई आर्थिक सुधर कार्यक्रम आरम्भ किए जिसे नई आर्थिक नीति के नाम से जाना जाता है I नई स्र्थिक नीति के तीन विस्तृत घटक निम्न प्रकार है : उदारीकरण निजीकरण वैश्वीकरण   आर्थिक सुधार : आर्थिक सुधारो से अभिप्राय उन सभी उपायों से है जिनका उधेश्य अर्थव्यवस्था को अधिक कुशल, प्रतियोगी तथा विकसित बनाना है I मुख्य आर्थिक सुधर, अदारिक्रण, निजीकरण और वैश्वीकरण है I   आर्थिक सुधारो की आवश्यकता :   राजकोषीय घटे में व्रद्धी : सन 1991 से पहले सरकार के गैर-विकासात्मक खर्चो में निरंतर व्रद्धी होने के कारण राजकोषीय घाटा बढ़ता जा रहा था I राजकोषीय घटे से अभिप्राय सरकार के कुल व्यय तथा कुल प्राप्तियो का अंतर है I यह सरकार…
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Chapter- 5 भारत का विदेशी व्यापार

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अंतराष्ट्रीय व्यापार के लाभ : अंतराष्ट्रीय व्यापार अंतराष्ट्रीय विशिष्टीकरण को सुविधाजनक बनाता है, अंतराष्ट्रीय व्यापार उन आवश्यक वस्तुओ तथा सेवाओ के आयात को सुविधाजनक बनाता है जिनका उत्पादन घरेलू अर्थव्यवस्था में नही किया जा सकता, अंतराष्ट्रीय व्यापार विदेशी विनिमय कमाने का एक महत्वपूर्ण साधन है जो अल्पविकसित देशो के लिए विकास-सम्बन्धी यतो को बनाने के लिए अत्यंत आवश्यक है, स्वतंत्र आयात व्यापार करने वाले देशो के लोगो के जीवन की गुणवत्ता को प्रोत्साहित करता है क्योकि लोगो को अंतराष्ट्रीय प्रतियोगी दरो पर बड़ी मात्रा में विविध प्रकार की वस्तुए और सेवाए प्राप्त हो जाती है I   स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारत के विदेशी व्यापार का परिणाम : स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारत के विदेशी व्यापार का परिणाम अत्यंत कम था I व्यापार की रचना देश की गतिहीन तथा पिछड़ी…
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Chapter- 4 औधोगिक विकास की रणनीति

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    एक अर्थव्यवस्था में उद्धोग के महत्व को बतलाने वाले बिंदु : अर्थव्यवस्था मए संरचनात्मक रूपांतरण लाता है : औध्दोगिक विकास अर्थव्यवस्था में संरचनात्मक परिवर्तन/रूपांतरण लाता है I उद्दोगो के आभाव में आर्थिक सम्वृध्दी कृषि विकास पर आश्रित रहती है और मनुष्य केवल अनाज तथा मोटे कपड़ो जैसी मजदूरी वस्तुओ पर मात्र निर्भर रहते है I   उद्धोग रोजगार का एक श्रोत है : उद्दोग रोजगार का महत्वपूर्ण श्रोत है विशेषकर जब एक देश की जनसंख्या कृषि भूमि की अव्शोष्ण क्षमता से अधिक बढ़ जाती है I   उद्धोग कृषि के यंत्रीकृत साधन उपलब्ध कराता है : कृषि के यंत्रीकरण में उध्दिग निर्णायक भूमिका निभाते है I मशीनों का प्रयोग उधोगो के विकास एवं सम्वृध्दी के कारण संभव हुआ है I यंत्रीकरण के कारण कृषि उत्पादकता में प्रतिपादक व्रद्धी…
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