11th development Chapter-7 निर्धनता

निर्धनता क्या है और निर्धन कौन है ?

निर्धनता से अभिप्राय है उस स्थिति से है जब कोई व्यक्ति अपनी जीवन न्यूनतम उपभोग आवश्यकताओ की प्राप्ति नहीं कर पाता , न्यूनतम आवश्यकताओ में भोजन, वस्त्र, मकान, शिक्षा तथा स्वास्थ्य सम्बन्धी न्यूनतम मानवीय आवश्यकताए शामिल होती है I

निर्धनता की दो विभिन्न अवधारणाए होती है :

  1. सापेक्ष निर्धनता
  2. निरपेक्ष निर्धनता

 

  1. सापेक्ष निर्धनता : सापेक्ष निर्धनता से अभिप्राय विभिन्न वर्गो प्रदेशो या दुसरे देशो की तुलना में की जाने वाली निर्धनता से है I जिस देश या वर्ग के लोगो का जीवन स्तर या निर्वाह स्तर निचा होता है वे उच्च जीवन स्तर या निर्वाह स्तर के लोगो या देश की तुलना में गरीब या सापेक्ष रूप से निर्धन माने  जाते है I

 

  1. निरपेक्ष निर्धनता : भारत में निरपेक्ष निर्धनता का अनुमान लगाने के लिए निर्धनता रेखा का प्रयोग किया-गया है I निर्धनता रेखा वह रेखा है जो उस प्रति व्यक्ति औसत मासिक व्यय को प्रकट करती है जिसके द्वारा लोग अपनी न्यूनतम अव्यश्क्ताओ को संतृष्ट कर सकते है I भारत में 1999-2000 की कीमतों पर Rs. 328 ग्रामीण क्षेत्र में तथा Rs. 459 शहरी क्षेत्र में प्रति मॉस उपभोग को निर्धनता रेखा माना गया है I जिन लोगो का प्रतिमाह उपभोग व्यय इससे कम है उन्हें निर्धन माना जाता है I

 

ग्रहस्थो के लिए कैलोरी मानदंड का निर्धारण

  • कैलोरी मानदण्ड बच्चो के लिए 300 प्रतिदिन
  • कठिन परिश्रम करने वाले युवा व्यक्तियों के लिए 3,600 प्रतिदिन
  • ग्रामीण तथा शहरी लोगो में क्रमशः 2,435 तथा 2,045 कैलोरी निर्धारित की जाती है I

 निर्धनता का श्रेणीकरण

  1. चिरकालिक निर्धन : वेजो सदैव निर्धन बने रहते है और जो सामान्यतः निर्धन रहते है I उदाहरण: भूमिरहित श्रमिक और अनियमित मजदूर I
  2. अल्पकालिक निर्धन : (i) वे सभी व्यक्ति जो निरंतर निर्धन और गैर-निर्धन वर्गो के बीच आते-जाते रहते है (जैसे मौसमी मजदूर) और (ii) अनियमित निर्धन I
  3. कभी निर्धन नही : वे व्यक्ति जो कभी निर्धन नहियो होते, इन्हें गैर-निर्धन कहा जाता है I

 

निर्धनता के कारण

 

(1) राष्ट्रिय उत्पाद का निम्न स्तर : भारत का कुल राष्ट्रिय उत्पाद जनसंख्या की तुलना में काफी कम है I इस कारण भी प्रति व्यक्ति आय कम रही है I भारत का शुध्द राष्ट्रिय उत्पाद 2008-09 में चालू कीमतों पर Rs.33,12,569 करोड़ था तथा उसी वर्ष की प्रति व्यक्ति आय केवल Rs.37,490 थी, जो यु०एन०ओ द्वारा निर्धारित मानदण्ड के अनुसार एक निर्धन  देश की प्रति व्यक्ति आय है I

 

(2) विकास की कम दर : भारत में पंचवर्षीय योजनाओ के दौरान विकास की दर बहुत कम रही है I योजनाओ की अवधि में सकल घरेलू उत्पाद की विकास दर लगभग प्रतिशत रही है परन्तु जनसंख्या की व्रद्धी दर लगभग 2 प्रतिशत होने से प्रत्ति व्यक्ति आय में व्रद्धी केवल 2.4 प्रतिशत हुई है I प्रति व्यक्ति आय में निम्न व्रद्धी दर निर्धनता का एक मुख्य कारण है I

 

(3) जनसंख्या का अधिक दवाव : भारत जनसंख्या द्रुगती से बढ़ रही है I इस व्रद्धी का कारण पिछले कई वर्षो से मृत्यु दर में कमी तथा जन्म दर का लगभग स्थिर रहना है I जनसंख्या व्रद्धी की यह दर, जो 1941-51 में 1.0 प्रतिशत थी, बढकर 1991-2001 में 2.1 प्रतिशत हो गई है I 2008-09 में भारत की जनसंख्या बढकर 115.4 करोड़ हो गई, जबकि 1991 की ज्न्ग्रना के अनुसार जनसंख्या 84.63 करोड़ थी I अधिक जनसंख्या निर्भरता भर को बढ़ा देती है, जिससे समय के साथ-साथ निर्धनता और अधिक हो जाती है I

 

(4) स्फितिक दबाव : उत्पादन की निम्त दर तथा जनसंख्या व्रद्धी की ऊँची दर के फलस्वरूप भारत जैसी अल्पविकसित अर्थव्यवस्थाए स्फितिक दबाव के जाल में फंस जाती है I मुद्रा-स्फीति भारतीय अर्थव्यवस्था का एक स्थाई लक्षण बना हुआ है I इसका तात्पर्य है कीमतों में निरंतर व्रद्धी की स्थिति I कीमत व्रद्धी से बुरी तरह प्रभावित कौन होता है ? निश्चित रूप से मजदूरी करने वाला I अतः निर्धन के और अधिक निर्धन होने की प्रवर्ती बनती चली जाती है I

 

(5) चिरकालीन बेरिज्गरी एवं अल्परोजगार : भारत में चिरकालीन बेरोजगारी व अल्परोजगार पाया जाता है I कृषि में अद्रश्य या छिपी बेरोजगारी शेहरी क्षेत्रों में शिक्षित बेरोजगारी से भी बदतर है I बेरोजगारी की समस्या निर्धनता का मुख्य कारण है I भारत के आर्थिक सर्वेक्षण 2007-08 के अनुसार, 2006-07 में, लगभग 4.45 करोड़ व्यक्ति बेरोजगार थे I

 

(6) पुंजी की अपर्याप्तता : पुंजी आर्थिक विकास का एक सहायक तत्व है I पुंजी संचय को किसी राष्ट्र की उत्पादन शमता के एक सूचक के रूप में प्रयोग किया जा सकता है I धारणीय विकास के लिए आवश्यक पुंजी का स्टाक तथा पुंजी का निर्माण दुर्भाग्यवश अभी भी इसकी आवश्यकता की तुलना में काफी कम है I निम्न पुंजी निर्माण का अर्थ है कम उत्पादन क्षमता और इसलिए अर्धानता I

 

(7) योग्य एवं निपूर्ण उध्द्म्कर्ताओ का अभाव : किसी भी देश में औध्दोगिक विकास की प्रारम्भिक अवस्था में साहस की योग्यता रखने वाले तथा अपने कार्य में दक्ष, निपुण एवं चतुर उध्द्म्कर्ताओ की आवश्यकता होती है परन्तु दुर्भाग्यवश हमारे देश में एसे उध्द्मक्र्ताओ की बहुत कमी है I फलस्वरूप, देश में उत्पादन प्रक्रिया बहुत निम्न स्तर पर रही है I उत्पादन प्रक्रिया के निम्न स्तर का अर्थ रोजगार का निम्न स्तर तथा निर्धनता का उच्च स्तर है I

 

(8) पुराणी सामाजिक संस्थाए : हमारे देश की अर्थव्यवस्था का मूल सामाजिक आधार पुरानी सामाजिक संस्थाए तथा रूढ़िया है जैसे- जाती प्रथा, सयुक्त परिवार प्रथा और उत्तराधिकार के नीम आदि I ये सब हमारी अर्थव्यवस्था के गत्यात्मक परिवर्तनों में बाधा उत्पन्न करते है I इससे विकास दर में रिकाव्त आती है तथा इसका परिणाम निर्धनता होता है I

 

(9) आधारिक संरचना का अभाव : आर्थिक आधारिक संरचना के प्रमुख घटक जैसे उर्जा, यातायात तथा संचार और सामाजिक आधारिक संरचना के प्रमुख घटक जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य तथा निवास सेवाए इसकी आवश्यकता की तुलना में बहुत न्यून या अपूर्ण है I आर्थिक और सामाजिक आधारिक संरचना सम्वृध्दी तथा विकास की आधारशिला के रूप में कार्य करते है I दुर्भाग्यवश नियोजन की 59 वर्षो की अवधि के बावजूद भी यह अपर्याप्त है I विकास की धीमी गति तथा निर्धनता का नर्न्त्र बने रहना इसके स्पष्ट परिणाम है I

 

 

भारत में निर्धनता दूर करने के चार मुख्य उपाय है जो इस प्रकार है:

  • आर्थिक विकास की गति को तेज करके निर्धनता का सामना
  • राजकोषीय तथा क़ानूनी उपायों द्वारा आय की असमानता का सामना करना
  • जनसंख्या नियन्त्रण द्वारा निर्धनता का सामना करना
  • निर्धनों के जीवन की गुणवत्ता को बढ़ाने वाले अन्य उपाय

 

आर्थिक विकास की गति को बढ़कर या तेज करके निर्धनता का सामना करना

भारत में निर्धनता की समस्या के समाधान के लियी विकास की गति को तेज करना एक मुलभुत उपाय है I विकास की गति में तब तेजी आयेगी जब रोजगार के नए अवसरो का स्रजन होगा I खेतो तथा कारखानों में अधिक से अधिक मजदूरों को रोजगार उपलब्ध होगा I रोजगार जितना अधिक होगा आय उतनी अधिक होगी, परिणामित निर्धनता उतनी ही कम होगी I

 

राजकोषीय तथा क़ानूनी उपायों द्वारा आय की असमानता का सामना करना

निर्धनता का सामना निम्नलिखित राजकोषीय तथा क़ानूनी उपायों द्वारा किया जा सकता है :

राजकोषीय उपाय : से अभिप्राय कराधान और आर्थिक सहायता से है I निर्धनता कम करने के लिए सरकार प्रगतिशील कर संरचना को अपना सकती है I इससे तात्पर्य धनी वर्ग की आय (सम्पत्ति) पर कर की ऊँची दर का लगाना है I सरकार की कलर प्राप्तियो का प्रयोग समाज के निर्धन वर्ग द्वारा खरीदी जाने वाले वस्तुओ में आर्थिक सहायता के रूप में किया जा सकता है I जैसे’; मोटा कपड़ा तथा मोटा अनाज आदि मदों के लिए आर्थिक सहायता प्रदान की जा सकती है I

 

क़ानूनी उपाय : से अभिप्राय न्यूनतम मजदूरी अधिक्निय्म से है जिसके अनुसार मालिको के लिए यह अनिवार्य है कि वे अपने कर्मचारियों को अनुबंधित न्यूनतम मजदूरी दें I क़ानूनी उपायों के अंतर्गत कृषि उत्पादों की खरीद के लिए ‘पटल कीमत’ जैसी नीतियाँ भी शामिल है I इससे अभिप्राय उस अनुबंधित न्यूनतम कीमत से है जो किसानो को उनके उत्पादों की खरीद के बदले में अवश्य दी जाए I ‘शिक्षा का अधिकार’ जैसे क़ानूनी उपायों के ने उदाहरण है जो समाज के निर्धन वर्ग के जीवन की गुणवत्ता के लिए जरूरी है I

 

जनसंख्या नियन्त्रण द्वारा निर्धनता का सामना करना

निर्धनता को दूर कररने के लिए जनसंख्या की व्रद्धी दर पर रोक लगाना अव्यश्य्क है I भारत का अनुभव यह दर्शाता है कि जनसंख्या में व्रद्धी के कारण राष्ट्रिय आय में व्रद्धी काफी मात्रा में निष्प्रभावित हुई है I इसके फलस्वरूप प्रति व्यक्ति आय निम्न ही बनी हुई है I  निर्धनता का उन्मूलन तभी हो सकता है जब जनसंख्या की व्रद्धी को कम किया जाए ताकि GDP में व्रद्धी का प्रतिबिंब प्रति व्यक्ति GDP में व्रद्धी के रूप में दिखाई दे I

 

निर्धनों के जीवन की गुणवत्ता को बढ़ाने वाले अन्य उपाय

(1) कृषि का विकास : निर्धनता को दूर करने के लिए क्रषि का विकास करने का विशेष उन्नत बीज, सिचाईं के साधनों तथा रासायनिक और कम्पोस्ट खाद का विशेष प्रयोग किया जाना चाहिए, छोटे किसानो को उचित प्रकार की आर्थिक सहायता दी जानी चाहिए I

 

(2) कीमत स्तर में स्थिरता : निर्धनता उन्मूलन के लिए कीमत स्थिरता एक आवश्यक शर्त है I यदि, कीमतों में निरंतर व्रद्धी होती रहेगी तो निर्धन लोगो का जीवन स्तर और भी निचा होता जाएगा I कीमतों में स्थिरता तभी लाइ जा सकती है जब (i) खाद्य तथा अन्य आम वस्तुओ का उत्पादन बढ़ाया जाएगा और (ii) जब सामान्य उपभोग वाली वस्तुओ का निर्धन वर्ग में वितरण ‘उचित मूल्य दुकानों’ द्वारा किया जाएगा I

 

(3) बेरोजगारी का उन्मूलन : यदि निर्धनता को दूर करना है तो बेरोजगारी, अर्द्ध-बेरोजगारी तथा छिपी बेरोजगारी को दूर करने के विशेष उपाय अपनाने चाहिए I ग्रामीण क्षेत्र में रोजगार बढ़ाने के अधिक अवसर है, उनका पूरा लाभ उठाना चाहिए I ग्रामीण क्षेत्र में विशेष रूप से कुटीर उद्योग तह क्रियाओ को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए I शिक्षित युवको की बेरोजगारी को कम करने के लिए व्यावसायिक शिक्षा प्रणाली को उच्च प्राथमिकता दी जनि चाहिए I

 

(4) उत्पादन की तकनीक में परिवर्तन : भारत में उत्पादन की श्रम प्रधान तकनीक अपने जानी चाहिए I इस तकनीक को अपनाने से रोजगार की मात्रा बढ़ेगी तथा निर्धनता दूर होगी I

 

(5) निर्धनों की न्यूनतम आवश्कताओ का प्रावधान : सरकार को निर्धनो की न्यूनतम आवश्यकताओ जैसे पिने का पानी, प्राथमिक चिकित्सा, प्राथमिक शिक्षा आदि को संतुष्ट करने के प्रयत्न करने चाहिए I इसके लिए सार्वजनिक क्षेत्र को अधिक से अधिक व्यय करना चाहिए I

 

(6) पिछड़े क्षेत्रो पर विशेष ध्यान : भारत में कुछ क्षेत्र जैसे- ओड़िसा, नागालैंड, उत्तर प्रदेश, बिहार आदि अत्यंत पिछड़े हुए एवं निर्धन है I सरकार को पिछड़े इलाको में विशेष सुविधाए देनी चाहिए जिससे निजी पुंजी उन प्रदेशो में निवेश की जा सके I

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