11th Development Chapter- 4 औधोगिक विकास की रणनीति

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  1. एक अर्थव्यवस्था में उद्धोग के महत्व को बतलाने वाले बिंदु :
  2. अर्थव्यवस्था मए संरचनात्मक रूपांतरण लाता है : औध्दोगिक विकास अर्थव्यवस्था में संरचनात्मक परिवर्तन/रूपांतरण लाता है I उद्दोगो के आभाव में आर्थिक सम्वृध्दी कृषि विकास पर आश्रित रहती है और मनुष्य केवल अनाज तथा मोटे कपड़ो जैसी मजदूरी वस्तुओ पर मात्र निर्भर रहते है I

 

  1. उद्धोग रोजगार का एक श्रोत है : उद्दोग रोजगार का महत्वपूर्ण श्रोत है विशेषकर जब एक देश की जनसंख्या कृषि भूमि की अव्शोष्ण क्षमता से अधिक बढ़ जाती है I

 

  • उद्धोग कृषि के यंत्रीकृत साधन उपलब्ध कराता है : कृषि के यंत्रीकरण में उध्दिग निर्णायक भूमिका निभाते है I मशीनों का प्रयोग उधोगो के विकास एवं सम्वृध्दी के कारण संभव हुआ है I यंत्रीकरण के कारण कृषि उत्पादकता में प्रतिपादक व्रद्धी हुई है I कृषि में यंत्रीकरण के कारण ही भारत पर्याप्त खाद्दान्न के उत्पादन में सफल हुआ है I

 

  1. उद्धोग विकास प्रक्रिया को गत्यात्मकता प्रदान करता है : उद्दोग विकास/सम्वृध्दी प्रक्रिया को गत्यात्मकता प्रदान करता है I उद्दोगो के आभाव में, विकास प्रक्रिया केवल जीवित रहने के लिए खाद्दान्न पैदा करने तक ही सिमित रहती I औध्दोगिकीकरण ने मानवीय जीवन में नए यमो को बढ़ाया है I

 

  1. औद्योगिकीकरण के कारण सभ्यता का विकास होता है : श्रीकरण ने सभ्यता के विकास को जन्म दिया है I लोग अब अपने जीवन की गुणवत्ता के लिए सजग है I उपभोग प्रतिमानों के उच्च स्तरों को प्राप्त कररने के लिए वे अब कठिन परिश्रम करते है I इन परिवर्तनों के कारण ही विश्व में विभिन्न भागो में सांस्कृतिक दृष्टि से भिन्न-बहीण प्रकार के समाज एक-दुसरे के समीप आते जा रहे है और संसार की विभिन्न अर्थ्वव्य्वास्थाये एक विश्वव्यापी अर्थव्यवस्था में समन्वित हो रही है I

 

  1. उद्धोग आधारित संरचना विकास को सुविधाजनक बनता है, उद्धोग सम्वृध्दी की अनिवार्य शर्त है I

 

  1. औधोगिक विकास में राज्य की भूमिका बहुत अधिक निर्णायक रही है I भारतीय अर्थव्यवस्था में विकास के जब योजनाबद्ध कार्यक्रम शुरू किए गे थे, औद्योगिकीकरण की प्रक्रिया में राज्य के प्रत्यक्ष हस्तछेप का सुझाव निम्नलिखित तथ्यों की दृष्टि से दिया गया था :
  • निजी उद्दमियो के पास पुंजी का आभाव : भारत में औध्दोगिक विकास के लिए निवेश के एक बड़े धक्के की आवयश्कता थी I इसके लिए बड़ी मात्र में पुंजी की आवश्यकता थी I स्वतंत्रता प्राप्ति के समय. भारत के मुख्य जाने-मने निजी उद्धमी टाटा तथा बिरला थे I

 

  1. निजी उधमियो में निवेश प्रेरणा का आभाव : निजी निवेशको में प्रेरणा का भी आभाव पाया गया I बाजार का आकार सिमित होने के कारण, निवेश के लिए कोई प्रलोभन नही था I बाजार के सिमित आकार से अभिप्राय बाजार में औध्दोगिक वस्तुओ की मांग के स्तर का निम्न होना है I मांग के निम्न स्तर का कारण आय का निम्न स्तर था I

 

  1. यह बड़ी तेजी से महसूस किया जा रहा था कि समाज के समाजवादी ढाँचे का प्रमुख उधेश्य, औद्योगिकीकरण की पक्रिया में, केवल सरकार के प्रत्यक्ष हस्तछेप द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है I

 

सन 1956 की औध्दोगिकी नीति की मुख्य विशेषताए निम्नलिखित है :-

  1. उद्दोगो का तीन श्रेणियों में वर्गीकरण :

(a) वे उद्दोग जिनकी स्थापना तथा विकास केवल सार्वजनिक क्षेत्र के उद्दमो के रूप में किया जाएगा I

(b) वे उद्दोग जिनकी स्थापना निजी तथा सार्वजनिक दोनों क्षेत्रों के उद्दमो के रूप में की जाएगी I किन्तु निजी क्षेत्र केवल गौण भूमिका निभाएगा I यह सार्वजनीक क्षेत्र के प्रयत्नों में पूरक रूप में कार्य करेगा I इस श्रेणी के नए उद्दम केवल सार्वजनिक क्षेत्र में ही स्थापित किए जाएंगे I

(c) उपरोक्त (i) तथा (ii) श्रेणियों के उद्दोगो के आतिरिक्त अन्य सभी उद्दोगो कको निजी क्षेत्र के लिए छोड़ दिया गया I

  1. औध्दोगिक लाइसेंसिंग : निजी क्षेत्र में उद्दोगो को अथापित करने के लिए सरकार से लाइसेंस लेना आवश्यक बना दिया I लाइसेंसिंग नीति के पीछे मूल विचार उद्दोगो की पिछड़े क्षेत्रों में स्थापना को प्रोत्साहित करना था जिससे क्षेत्रीय अमानता का उद्देश्य प्राप्त किया जा सके I

 

  • औध्दोगिक रियायते : औध्दोगिकिक्रण की प्रक्रिया में जहाँ सरकार की भूमिका प्रमुख होगी वहां देश के पिछड़े क्षेत्रों में उद्दोगो की स्थापना हेतु निजी उद्दमीयो को की प्रकार की रियायते प्रदान की गई I

 

 

छोटे पैमाने के उद्दोगो की तीन मुख्य विशेषताए :

  1. ये उद्दोग बड़े पैमाने के उद्दोगो की तुलना में अधिक श्रम-गहन है I इसलिए अर्थव्यवस्था में अधिक रोजगार अवसर पैदा करने के लिए आयोजक लघु उद्दोगो पर अधिक निर्भर हुए I
  2. छोटे उद्दोग स्थान निर्धारण लचीलेपन को प्रकट करते है जो अंतरक्षेत्रिय समानता प्राप्त करने में अधिक उपयुक्त है,
  • छोटे पैमाने के उद्दोगो को कम निवेश की आवश्यकता होती है और इसलिए ये साम्य-परक है I

 

1950-1990 के दौरान औध्दोगिक विकास की रणनीति की मुख्य विशेषताए :

  1. औध्दोगिकीकरण की प्रक्रिया में सार्वजनिक क्षेत्र को एक केन्द्रीय भूमिका निभानी थी,
  2. निजी क्षेत्र को द्वितीयक भूमिका निभानी थी और वह भी परमिट-लाइसेंस राज के अंतर्गत,
  • औद्दोगिकीकरण की प्रक्रिया को आयात प्रतिस्थापन के मुख्य नीति संयंत्र के अनुसार आगे बढना था,
  1. घरेलू उद्दोग को विदेशी प्रतियोगिता से संरक्ष्ण दिलवाना था,
  2. अर्थव्यवस्था में आधारित संरचना के आधार को सशक्त करने की दृष्टि से बड़े पैमाने की उद्दोगो का विकास किया जाना था,
  3. रोजगार तथा साम्य के उद्देश्य्यो को प्राप्त करने हेतु छोटे पैमाने के उद्दोगो का विकास किया जाना था I

 

औध्दोगिकीकरण की रणनीति ने अच्छे प्रभावों को उत्पन्न किया : जो निम्नलिखित है :

  1. औध्दोगिक उत्पादन में विशेष व्रद्धी हुई,
  2. औध्दोगिक क्षेत्र का विविधिकरण हुआ,
  • बड़े पैमाने के उद्दोग सफलतापुर्वक शुरू किए गए,
  1. देश के विभिन्न क्षेत्रों में छोटे पैमाने के उद्दोगो का काफी विस्तार हुआ I

 

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