11th Economics, Chapter -3 कृषि की विशेषताए, समस्याए एवं नीतियाँ

 

  • कृषि से अभिप्राय उन सभी क्रियाओ से है जिनका सम्बंध फसलो के उत्पादन के लिए भूमि को जोतने से है- फसलें है : खाद्दान फसलें (जैसे चावल और गेंहूँ) और गैर-खाद्दान फसलें (जैसे- जुट और कपास) I

 

यह अर्थव्यवस्था के प्राथमिक क्षेत्र का वह प्रमुख घटक है जो प्राक्रतिक संसाधनो के शोषण द्वारा उत्पादन पर बल देता है I कृषि उन वस्तुओ को उपलब्ध करती है जो मानवीय जीवन की उत्तरजीविता के लिए अत्यंत आवश्यक है I इसलिए फसलो की खेती की विश्व के सभी भागो में बहुत ही महत्वपूर्ण क्रियाओ में से एक क्रिया के रूप में पहचान की जाती है I

 

भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि के महत्व

 

  1. GDP में योगदान:- भारत में कृषि की का एक अहम योगदान है ,भारत के GDP में लगभग 20% का योगदान है !

 

  1. मजदूरी वस्तुओ की पूर्ति :- भारत में कृषि मजदूरी वस्तुओ की पूर्ति करता है इसलिय कृषि मजदूरी वस्तुओ का एक महत्वपूर्ण श्रोत है, मजदूरी वस्तुएं वे वस्तुएं होती है जिन्हें देश की जनता अपने जीवन योग्य अवश्यकताओ को संतुस्ट करने के लिय उपभोग करती है उदहारण दाल ,चावल, आदि !

 

  1. रोजगार : भारत में कृषि रोजगार का एक महत्वपूर्ण श्रोत है ! भारत में आज लगभग 60% लोग कृषि में लगे हुए है ! इसलिय यह भारत में कृषि एक जीवन निर्वाह का महत्वपूर्ण श्रोत है !

 

  1. अंतराष्ट्रिय तथा घरेलू व्यापार में महत्वपूर्ण योगदान:- कृषि का अंतराष्ट्रिय तथा घरेलू व्यापार में महत्वपूर्ण योगदान रहा है ! भारत जूट , चाय, काजू ,तंबाकू  और मसाले आदि कृषि वस्तुओ का निर्यात करता है !

 

  1. यातायात उद्दोग का आर्थिक आधार:-कृषि भारत में यातायात उद्योग का एक बहुत बड़ा आधार है !भारत में रेल और सड़क के माध्यम से कृषि वस्तुओ का ले जाया जाता है !

 

  1. कृषि भूमि तथा सम्बन्धित परिसम्पत्तियां :-कृषि राष्ट्रिय सम्पत्ति का एक महत्वपूर्ण घटक I

 

भारतीय कृषि की विशेषताए :

  1. निम्न उत्पादकता स्तर: भारत में दुसरे बड़े देशो की तुलना में उत्पादन में बहुत कम है जिसका एक कारण भारत में उत्पादन की तकनीक भी है ! चावल उत्पादन में भी भारत अमेरिका और चीन से पीछे है

 

  1. छिपी बेरोजगारी :- कृषी भारत में छिपी हुई बेरोजगारी को सामने लाने वाला एक क्षेत्र है क्योकि भारत में सबसे ज्यादा छपी हुई बेरोजगारी ग्रामीण क्षेत्र में पाई जाती है ,इस बेरोजगारी में एक कम में आवश्यकता से अधिक लोग लगे होते है जिस कारण सबको कामकरने के बाद भी कम आय प्राप्त होती है !

 

  1. वर्षा पर निर्भर :भारत में मौसम के प्रति बहुत अधिक सम्वेदनशील पाई जाती है भारतीय कृषि प्रधानतः मानसून पर निर्भर है, क्योंकि आज भी कुल कृषि योग्य भूमि के 41 प्रतिशत में सिंचाई होती है। देश में वृहत और मध्यम सिंचाई योजनाओं के जरिए सिंचाई की पर्याप्त संभवनाओं का सृजन किया गया है। देश में सिंचाई की कुल संभावना वर्ष 1991-1992 के 1 मिलियन हेक्टेअर से बढ़कर मार्च 2007 तक 102.77 मिलियन हेक्टेअर हो गई है। मानसून पर इतनी अधिक निर्भरता का प्रभाव यह होता है कि देश के अधिकांश भाग की कृषि प्रकृति की दया पर निर्भर है।

 

  1. जीवन निर्वाह : भारत में आज भी किसान कृषि केवल जीवन निर्वाह दृष्टिकोण से ही करते है इसका अर्थग यह हे की आज भगी किसान बजे कृषि का व्यापार करने के केवल जीवन नीरव के लिय करते है !

 

  1. पारम्परिक आगतो का प्रयोग: भारत में आज भी किसान खेती करने के लिय वही पुराने तरीके का प्रयोग करते है ,जबकि आज के समय में कई उन्नत किस्म की तकनीक उपलब्ध है !

 

  1. छोटी तथा बिखरी जोतें: भारत में किसानो के पास जमीन या तो है ही नहीं और है भी तो वो बहुत कम है अर्थात खेत बहुत छोटे है जिस कारण किसान अपनी कुशलता का पूर्ण प्रयोग नहीं कर पाता !

 

  1. भू-स्वामियों और भू-जोतने वालो के बीच संबंध : आज नही भारत में भू-स्वामियों द्वारा किसानो का शोषण किया जाता है जिस कारण किसान खेती से दूर होते जा रहे है !

 

 

भारतीय कृषि की समस्याएँ

  1. संचाई के स्थाई साधनों का अभाव : भारत में फसल खेती अधिकांश रूप में वर्षा पर निर्भर है I सिंचाई के स्थाई अध्नो का बहुत अधिक आभाव है I कृषि उत्पादन में स्थिरता के लिए अवश्यक है कि देश के सभी भागो में सिंचाई के स्थाई साधन विकसित किए जाए I

 

  1. वित्त का आभाव : किसानो को बीज, उर्वरक तथा अन्य अम्ब्न्धी आगतो को खरीदने के लिए अल्पकालीन वित्त की आवश्यकता होती है; ट्रेक्टर, थ्रेशर आदि खरीदने के उन्हें दीर्घकालीन वित्त की आवश्यकता होती है I जैसे:- महाजन तथा भू-स्वामी I

 

  1. खेती के पारम्परिक द्रष्टिकोण : भारतीय कृषक फार्म-तकनीकी तथा फार्म-प्रबन्धन व्यवहार को स्वीकार करने के लिए अनिच्छुक है I उसके लिए खेती करना जीवन-निर्वाह का एकमात्र साधन है, यह कोई व्यापार नही है Iएक सामान्य भरतीय किसान में उद्दमशीलता का आभाव पाया जाता है और लाभ प्राप्त करने हेतु वह कोई जिखिम उठाना नही चाहता I

 

  1. छोटी तथा बिखरी जोतें : छोटी जोते आधुनिक उत्पादन तकनीक के उपयुक्त नही होती तथा बिखरी जोतो के कारण प्रबंध की लागत भुत्त बढ़ जाती है I छोटी तथा बिखरी जोते स्धुनिक यंत्रो; ट्रैक्टर, थ्रीश्र आदि के उपयोग में बहुत बड़ी बाधा हाई I

 

  1. शोषण कृषक सम्बंध : अधिकतर भू-स्वामी ‘अनुपस्थिति भू-स्वामी’ होते है वे अपनी जोतो को खेतो के लिए दुसरो को दे देते है और बहुत कम स्वयं खेती करते है I लगन आय पर निर्भर रहने से उनकी परवर्ती अपने पट्टेदारो का शोषण करना होता है I पत्तेदार जो वास्तव में भूमि पर खेती करते है, अधिकतर भू-स्वामी फसल के रूप में लगन वसूल करते है किन्तु खेती की लागत का कोई भार नही उठाते I बू-स्वामी को चुकाने के भाद पत्तेदार के पास बहुत कम आधिक्य्त बचता है, जिनका वह आगे निवेश कर सके I

 

  1. व्यवस्थित विपणन प्रणाली का अभाव : छोटे किसानो की बहुत बड़ी संख्या आज भी अपनी उपज स्थानीय मंडियों में कम कीमत पर बेच रहे है I निर्र्धं किसान स्थानीय महाजन/बनिये के पास अपनी उपज बेचने के लिए मजबूर है क्योकि उसी से उन्हें अपनी वित्तीय जरूरतों को पूरा करने के लिए ऋण लेना पड़ता है I

 

 

भारतीय कृषि में कृषि सम्बन्धी सुधार

इनका व्यापार रूप से निम्न में वर्गीकरण किया गया है :

  • तकनीकी सुधार
  • संस्थागत सुधार
  • सामान्य सुधार

तकनीकी सुधार : भारतीय कृषि में प्रौद्दोगिकी के स्तर को ऊँचा उठाने के लिए सरकार द्वारा निम्नलिखित कदम उठाए गए है :

 

  1. अधिक उपज देने वाले बीजो का प्रयोग : सन 1965 से भारतीय कृषि में अधिक उपज देने वाले बीजो ने परम्परावादी बीजो का स्थान ले लिया है I गेहूँ, बाजरा, चावल, मक्का, ज्वर तथा कपास के लिए विशेष रूप से अधिक उपज देने वाले बीजो के प्रयोग से कृषि उत्पादकता में व्रद्धी होने से हरित क्रांति आई I इनके अधिक उत्पादन तथा उचित वितरण के लिए राष्ट्रिय बीज निगम की स्थापना की गई I

 

  1. रासायनिक खाद का प्रयोग : क्र्तिशी की उत्पादकता को बढ़ाने के लिए रासायनिक खाद का धिक् प्रयोग किया जाने लगा है I गाँवो में कम्पोस्ट खाद के प्रयोग को भी प्रोत्साहित किया गया है I

 

  1. फसल संरक्षण के लिए कीटनाशक द्वइयो का प्रयोग : फसलो को बीमारी तथा कीड़ो-मकोडो से बचाने के लिए कीटनाशक द्वइयो के उचित प्रयोग के लिए अनेक कदम य्थाये गे है I इसके लिए 14 केन्द्रीय पौधों संरक्षण केंद्र स्थापित किए गए है I पौधों संरक्षण के लिए एकीकृत कीटाणुनाशक प्रबंध कार्यक्रम को अपनाया गया है साथ ही अधिक उपज देने वाली तकनीक को भी अपनाया गया है I

 

  1. वैज्ञानिक खेतो प्रबंध अभ्यास : खेती की पारम्परिक विधियों के स्थान पर वैज्ञानिक ढंग से खेती करने परर बहुत अधिक महत्व दिया गया है I इसके अंतर्गत फसलो, उनकी किस्मो का चुनाव, भूमि की तैयारी, फसल हेर-फेर, बीज का चुनाव, खाद का उचित प्रयोग, सुखी खेती आदि से अम्बन्धित बढिया कृषि वोधियो को अपनाने के प्रयत्न किए गए है I

 

  1. खेती के यंत्रीकृत साधन : कृषि यंत्रो, जैसे- ट्रेक्टरों तथा हार्वेस्टिंग के प्रयोग को लोगप्रिय बनाने के लिए के लिए कईप्रयत्न किए जा रहे I छोटे किसानो को सहकारी समितियों, छोटे तथा सीमांत कृषक एजेंसियों, शेत्रिय ग्रामीण बैंको तथा वाणिज्यिक बैंको से कृषि यंत्रो को खरीदने के लिए सस्ते ब्याज पर पुंजी प्राप्त होती है I

 

संस्थागत सुधार (इन्हें भूमि सुधार भी कहा जाता है)

 

  1. मध्यस्थो का उन्मूलन : मध्यस्थो जिन्हें जमीदारो के नाम से भी जाना जाता है, का उन्मूलन कर दिया गया है I स्वामित्व का अधिकार भूमि को वास्तविक रूप से जोतने वाले किसानो को दे दिया गया है I यह इस दृष्टि से किया गया है ताकि जमीदारो द्वारा किसानो का शोषण बंद किया जा सके I

 

  1. लगान का नियमन : सामान्यतः इनकी राशी फसल के मूल्य की 1/3 से अधिक नही है I

 

  1. चकबंदी : वर्ष 2004 तक 630 लाख एकड़ भूमि चकबंदी (इधर-उधर बिखरी हुई भूमि या खेतो को किसान को एक ही स्थान पर परिणित करना) के अंतर्गत लाइ जा चुकी थी I

 

  1. भूमि उच्चतम सीमा : निर्धारित उच्चतम सीमा से उपर की भूमि को सरकार ने स्वयं ले लिया और उसका पुनः वितरण छोटे किसानो अथवा भूमि रहित श्रमिको के बीच कर दिया गया है I

 

सामान्य सुधार : सामान्य सुधार में निम्नलिखित कदम शामिल है :

  1. सिचाई सुविधाओ का विस्तार : कृषि में उत्पादकता को प्रोत्साहित तथा स्थिर रखने की दृष्टि से सिचाई सुविधाओ का विस्तार किया गया ही I बहुउद्देशीय परियोजनाओ एवं ट्यूबवैलो के कारण अब सिचाई के अंतर्गत क्षेत्र में व्रद्धी हुई है I सन 2006-07 में अनुमानित सिचींत क्षेत्र 872 लाख हेक्टेयर था I

 

  1. साख का प्रावधान : किसानो की बदती साख जरूरतों को पूरा करने के लिए ग्रामीण विकास बैंक स्थापित किए गए है I राष्ट्रीयकरण के पश्चात् व्यापारिक बैंक भी किसानो की साख अवश्यकताओ की पूर्ति कर रहे है I किसानो के साख सुविधाओ को और आगे बढ़ाने के लिए क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक भी स्थापित इए गए है I

 

  1. नियमित बाजार एवं सहकारी विपरण समितियां : इसका उद्देश्य किसानो को अपनी उपज के लिए उचित कीमत उपलब्ध करना तथा मध्यस्थो के शोषण से उन्हें बचाना है I इन बाजारों का प्रशासन सरकार द्वारा नियुक्त बाजार समितियों द्वारा किया जाता है I ये अमितीय सुनिश्चित करती ही की किसानो को समय पर भुगतान हो जाए और यह भी सुनिश्चित करती है कि उपज के सही मिली एवं तौल के लिए विशिष्ट बातो और तौल उपायों का प्रयोग हो I

 

  1. कीमत समर्थन नीति : किसानो को कृषि उत्पादन में वृद्धि करते रहने की प्रेरणा देने के लिए यह आवश्यक है कि उन्हें बाजार की अनिश्चिताओ से सुरक्षित रखा जाए I इस नीति के अधीन सरकार किसानो को उसकी उपज के लिए एक न्यूनतम कीमत देने का विश्वास दिलाती है Iसरकार अपनी व्यापारी एजेंसियों द्वारा समर्थन कीमत पर किसानो द्वारा बेचीं जाने वाली उपज को खरीदने का प्रबंध करती है I

 

कृषि सम्बन्धी सुधारो की प्रमुख उपलब्धियां :

 

  • फसल उत्पादकता में व्रद्धी : पंचवर्षीय योजनाओ के दौरान कृषि उत्पादकता में पर्याप्त व्रद्धी हुई है I अन्य फसलो की उत्पादकता में व्रद्धी भी समान रूप से उत्साहजनक थी I दीर्घकाल की अवधि में कृषि उत्पादकता के स्तर में नर्न्त्र बदलाब के कारण भारतीय कृषि में स्न्र्चनात्म्क बदलाब आया है जिसे अब अर्थव्यवस्था के जिवंत या सक्रिय क्षेत्र के रूप में देखा जाता है I
  • क्षेत्रफल में या खेती के अंतर्गत कुल क्षेत्र में व्रद्धी : अधिक उपज देने वाली तकनीक के प्रयोग ने फसलो के बोने तथा काटने के बीच समय अंतर को काफी मात्र में कम कर दिया है I रासायनिक उर्वरको के प्रयोग ने भूमि के प्रति छोड़ने की जरूरत को दूर कर दिया है I इसके फलस्वरूप दोहरी फसल का उगाना एक मानक चलन के रूप में उभरा I इससे खेती के अंतर्गत कुल क्षेत्र में पर्याप्त वृद्धि हुई है I
  • व्यापारिक फसलो के पक्ष में फसल प्रतिमान में परिवर्तन : उत्पादकता में व्रद्धी तथा क्षेत्रफल में वृद्धि के फलस्वरूप उत्पादन में पर्याप्त वृद्धि ने कृषि में काफी बिक्री योग्य आधिक्य का सृजन किया है I इससे किसानो की आय बढ़ने लगी है, जिसका अर्थ है उनकी प्रयोज्य आय में वृद्धि I इससे प्रेरित होकर किसान जीवन निर्वाह फसलो से जुड़े रहने के बजाये व्यापारिक फसलो की ओर अग्रसर हो गए है I
  • किसानो के द्रष्टिकोण में परिवर्तन ; खेती को केवल जीवन निर्वाह के श्रोत के रूप में नही देखा गया है, इसकी पहचान लाभदायकता की अधिक सम्भाव्यता के साथ एक व्यापारिक जोखिम-भरे कम के रूप में होने लगी है I इसने उत्पादन की एक क्रिया के रूप में खेती को गत्यात्मकता प्रदान की है I
  • खाद्दान्न उत्पादन में आत्म-निर्भरता : फसल उत्पादन में व्रद्धी इतनी पर्याप्त रही है कि भारत ने खाद्दान्न का वफर स्टाक रखना शुरू कर दिया है ताकि खेती की निम्न पूर्ति के समय इसका प्रयोग किया जा सके I उत्पादन में क्रन्तिकारी व्रद्धी ने भारत को अपने पंचवर्षीय योजना के एक प्रमुख लक्ष्य ‘आत्म-निर्भरता के साथ सम्वृध्दी’ को प्राप्त करने में सहायता दी है I

 

भारतीय कृषि में हरित क्रांति : इससे अभिप्राय 1960 के दशक के मध्य में फसल उत्पादन में सार्थक व्रद्धी, तथा खेती के अंतर्गत कुल क्षेत्र में महत्वपूर्ण व्रद्धी द्वारा कृषि उत्पादन में क्रन्तिकारी व्रद्धी से है I इस व्रद्धी का एक और प्रमुख कारण HYV तकनीक का प्रयोग था, जिसमे शामिल है रशय्निक खाद/उर्वरको, कीटनाशक द्वइयो का उचित उपयोग I

 

भारत को एक अन्य हरित क्रांति की अभी भी आवश्यकता है : इसका कारण यह है कि 60वें दशक की हरित क्रांति के लाभ धीरे-धीरे कम हो रहे है और कृषि उत्पादों की पूर्ति तथा मांग के बीच अंतर फिर से एक चुनौती के रूप में उभर कर आ रहा है I

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